Thursday, July 29, 2010

दोस्त कहें या भगवान


दोस्त कहें या भगवान

तुम हो जीवन के पथदर्शक,
तुम हो जीने का आधार,
तुम्हारी छाया ही जीवन में,
बन गयी जीने का आसार।

मात पिता के प्यार का अहसास,
तुमने ही कराया है,
हे दोस्त मेरा जीवन अब तुम पर ही,
न्योछावर होने आया है।

मैं काम, क्रोधी, लोभी व आलशी,
परिचायक इनका कहलाता था,
तुमने ही मेरे जीवन को इन तत्वों से,
अंधकार मुक्त कराया है।

चाँद कि विलोम तुम सूरज जैसे,
पश्चिम कहें तो पूरब जैसे,
जिन पर तुम्हारी छाया है,
उन्होंने हर सुख पाया है।

सुख दुःख के साथी तुम हो,
तुम हो हर गुण का आधार,
तुमने ही एस मूरख को,
अतुलित दिया है प्यार।

प्रभु जैसे ही रूप मे, मै आपको,
देखते आया हूँ,
स्वीकार करो मेरी इस "दोस्ती" को,
मै झोली फैलाकर कर लाया हूँ।

दीपक पनेरू
मथेला सदन तुलसी नगर,
पॉलीशीट, हल्द्वानी