Thursday, November 18, 2010

दस साल का उत्तराखंड



आज विकास के लिए, फिर रोता मेरा पहाड़ है,
कही नदी बनी कहर, तो कही पहाड़ो की दहाड़ है,

दस साल का उत्तराखंड, अब लगा है बोलने,
धीरे धीरे पर अब सब, राज लगा है खोलने,

कि किसने बसाया है इसे, कौन उजाड़ने को है तैयार,
कौन बना बैठा है दुश्मन, कौन बना बैठा है प्यार,

शिक्षा का बाजारीकरण, और गरीबी कि मार,
फिर पहाड़ो से पलायन, फिर वही अत्याचार,

कोई दबा स्कूल के नीचे, कोई नदियों का बना निवाला,
कोई गिरा चट्टानों से और, कोई नहीं देखने वाला,

बस साल दर साल, इसके खंड खंड होते रहे,
अपनी पवित्र देव भूमि को, अब पवित्र कौन कहे ?

चोरी यहाँ मक्कारी यहाँ, हर चीज कि बाजारी यहाँ,
पानी भी लगा है बिकने, गरीब आदमी जाए कहा ?

चीख चीख कर ये सड़के, और छोटे छोटे रास्ते,
दम तोड़ रहे है सब , कोई जल्दी कोई आस्ते,

क्या निशंक क्या खंडूरी, विकाश से रही सभी कि दूरी,
अपने लिए है लड़े है सब, कौन करे जरूरतें पूरी,

केंद्र से करें उधारी, इन पर उधारी का पाप चड़ा,
डकार गए विकाश का पैसा, कौन इनमें हक़ के लिए लड़ा,

इस पांच सौ करोड़ का, क्या हिसाब ये बताएँगे,
छीन लिए जिन गरीबो के आशियाने, क्या फिर से ये बसायेंगे,

टिहरी डूबाकर इनके मन को, अभी तक ना चैन मिला,
पता नहीं क्या डूबेगा अब, कोई शहर या कोई जिला,

"दीपक" यही अब सोचकर, क्या क्या इनके बारे में लिखे,
कुछ करनी कुछ करतूत इनकी, सारी करनी यही दिखे,

उत्तराखंड अब बचपन से , कुछ समझदार होने को आया है,
अब थोडा मुस्कराने दो इसे, नेताओं ने खूब सताया है,



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