यूँही कोई बरगद नहीं होता साहब!
उसके लिए ईजा की तरह
पूस की रातों में
खुले आसमान के नीचे
बच्चों के गीले कपड़ों में
आँगड़ी और घाघरी में सोना पड़ता है।
बुबू के ठिनके से
बुके की रुई में
आग लगने तक का
इंतजार करना होता है।
एक घस्यारी के खुद के
वजन के बराबर
निरगंड भेवों, चट्टानों से
मखमली घास लेकर
सकुशल घर आना पड़ता है।
एक बैनी के शादी से पहले
सारे खून-पसीने को एक कर
अपने ईजा की मदद के लिए
ऊँचे पहाड़ों से गाड़-गधेरों तक
पूरी जमीन ऊबर करनी होती है।
एक आमा का
जिसकी आँखें और कान कमजोर हों
उनका तीन महीने की पोथी को
इशारों से समझकर
उसकी भूख मिटाने की
कोशिश करने तक का धैर्य रखना होता है।
एक चिलम पीते बूढ़े व्यक्ति
का आँगन में खाँसने भर से
घर में होने वाली हलचल
खेतों में लिहो लिहो में
बदलने तक का इंतजार करना होता है।
दीपक पनेरू
27-10-2020