Thursday, September 23, 2010

फोटो

मेरे द्वारा लिया गया ये फोटो हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिका जनपक्ष आजकल ने अपने (अक्टूबर-२०१०) वाले अंक में छापा है जिससे मुझे काफी प्रोत्साहन मिला.



Wednesday, September 22, 2010

बचपन


बचपन

मीठी हंसी की प्यारी पाठशाला,
पल पल दोस्तों से लड़ जाना,

छुट्टी हो जो दौड़ लगाकर,

सबसे आगे घर को जाना,


माँ लोरियों से कुछ कहती,
दादी सुनाती कविता अति प्यारी,

कभी बाघ शेर की लड़ाई,

कभी कुत्ते बिल्ली की यारी,


ओ बाबूजी का डांट लगाकर,

वही माँ का फिर से मानना,

वही बहन का दद्दा कहकर,

गुस्से को मुझसे दूर भगाना,

वही बस्ते के बोझ तले जो,

दबकर तन थक जाता था,
कभी नहीं जाऊंगा स्कूल,
बार बार मन में आता था,


पढने की ना अहमियत को समझा,

ये सब बचपन की नादानी थी,

खेल कुंद ही प्यारा था तब,

साथियों की टोली अज्ञानी थी,


छोटी छोटी बातों पर भी,

ओ आँखों का भर जाना,
प्यारी भोली आँखों पर से,
बहता मोतियों का खजाना,


कितना मासूम ओ बचपन,

भूलूँ सुहाने को,
लिखते सोचते ऑंखें भर आयी,

फिर वही मोती छलकाने को.

Tuesday, September 21, 2010

आशा


आशा

नया खेत और बीज नए,
सोचा बोऊंगा मेहनत से,
छलका पसीना पोचा मैंने,
मैले कुचेले तहमत से,

रही मजबूरी उन बीजों की,
जिनको था जमीं पर डाला,
प्यार दिया था अपने से ज्यादा,
अपने तन को मार डाला,

क्योंकि जब उगेगी डाली तब मैं,
अपने तन को सुख पंहुचाउंगा,
यही कह कर रहा बैठा मैं,
कल खेत जोतने जाऊंगा,

हुआ अधेरा रात आई और,
सो गया मैं मेहनत वाला,
नहीं पता मुझे मेरे जीवन में,
आने वाला है दिन काला,

उठा सबेरे बड़ी ख़ुशी से,
मौसम ने है साथ दिया,
लिए बैलों के जोड़ो को,
खेतो को है प्रस्थान किया,

मौसम ने जब बदला रंग,
देख राही परेशान हुआ,
राही लगायी जो भविष्य की आशा,
अब उस का कुछ ज्ञान हुआ,

मौसम बदला बरसा रिमझिम,
दिन आज का बर्बाद हुआ,
पूरे साल राही "आशा" कि,
कम मौसम से में आबाद रहा.