Tuesday, January 11, 2022

पुरखों की राह पर

एक दिन मेरी इस जवानी का 
घमण्ड भी टूटेगा डाँसी पत्थर की तरह
उसी की तरह चूर-चूर हो जाएगा
यौवन भी जिस पर मैं कभी इतराया होऊँगा

उस लालिमा लिए चेहरे पर
झुर्रियां पड़ी होंगी लाचार बुढ़ापे की तरह
दाँत और आँत में सामंजस्य बिठाने की
जद्दोजहद कर रहा होगा मन

हाथों में कम्पन होगा 
जैसे किसी अपने का
अहित कर दिया हो अनजाने में
यह जानकर

बच्चे भी अपनी काया-माया को
समटने में व्यस्त होंगे
एक वक्त का खाना ना मिलने पर
ऐसा लग रहा होगा जैसे कितने दिनों से
ना मिले हो भर पेट भोजन

और तपा दोगे एक दिन मुझे भी
तिथान के उन अधफूटे पत्थरों को
फोड़ने के लिए
जो कभी तपे होंगे मेरे पुरखों की
अन्त्येष्टि की आग में।



दीपक पनेरू
30 सितम्बर 2021

No comments:

Post a Comment