घास के मैदानों सा है जीवन
जो जितना सुंदर
ओ उतनी जल्दी खत्म
पल भर में उजाड़ और वीरान
समय बहुत बलवान है
वह यौवन को चौपट कर जाता है
बिना किसी मतलब के
जैसे दीमक अंदर ही अंदर
खा जाती है एक बड़े से दरख़्त को
जो एक हल्के हवा के झौंके से
गिर पड़ता है धम्म कर
जैसे कोई भारी पत्थर छूट गया हो
किसी बंजर दरदरी चट्टान की कोख से।
दीपक पनेरू
07 जुलाई 2022
जीवन का यथार्थ और मर्म है दाज्यू जो जितना सुंदर वह उतनी जल्दी खत्म
ReplyDeleteWaw sir bilkut shi bol hai apke
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