Monday, October 4, 2010

कुछ अनछुए पल

स्वरचित
एक छोटी सी कोशिश की है मैंने

उनकी यादों को दिल से लगाये बैठे थे,
अपने रोते हुए दिल को हसाए बैठे थे,
सुनहरे सपनो को सोचा पूरा करू,
तो देखा ओ किसी और को अपना बनाये बैठे थे.

मैं रहू न रहू पर यादों का सफ़र रहेगा,
कोई पराया तो कोई अपना रहेगा,
हम तो बिन पानी के मछली की तरह है,
तुम दूर हुए तो बस यादों का सपना रहेगा,

तुम्हारी यादों को चरागों की तरह,
तुम्हारी बातों को दिल से लगाकर,
जीने को कोशिश करता हूँ पर,
साँस अटकती है तुम्हारे बिना,
कभी अन्दर जाकर, कभी बाहर आकर.


कभी उनको कभी उनकी यादों को ,
कभी गुस्से को कभी उनकी बातों को,
दिल से लगाये बैठे है, कभी खुश तो कभी,
उनके तस्वीर के साथ हम मुरझाये बैठे है,
दिल तो करता है एक बार-
फिर मिलने की कोशिश करू,
पर ओ इससे अनजान हमको अपनों मैं भी,
पराया बनाये बैठे है.........

2 comments:

  1. दीपक जी, जिसे आप एक छोटी सी कोशिश कह रहे हैं, वह एक बेहद सुंदर सा बीज बोया है आपने और उसकी कोंपलें अब फूटने लगी हैं। मेरा विश्वास कीजिए यदि आप इसी प्रकार प्रेम एवं विश्वास से इसे सींचेंगे तो एक दिन उसका फल अवश्य आपको मिलेगा।
    बेहद सुंदर रचना है दीपक जी। बधाई स्वीकारिए

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  2. sach me bohot acchi hai... aisi koshish karte rahiyega :)
    aur aap plz word verification hata dijiye... us se comment karne me aasani hogi :)

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