
दिनांक 12-07-2010
नई किरन
उठो चलो अब देर हो गयी,
दादी बोली पोती से,
ठन्डे जल से मुह धोया और,
पोछा अपनी धोती से.
खाना खाओ माँ बोली,
चलो तैयार अब होना है,
आया सावन लाया खुशहाली,
नयी फसल अब बोना है,
दीदी बोली भैय्या से,
स्कूल चलो अब जाना है,
वही बोझ भरी बस्ते का,
वही रिक्शे वाला नाना है,
स्कूल पहुच तब छोटू बोला,
मजा बहुत अब आयेगा,
खेलूँगा नए दोस्तों के संग मैं,
ख़ुशी-कुशी दिन कट जायेगा,
स्कूलों में अब आई बहारें,
खिली हरियाली खेतों में,
"नई किरन" जब पड़ी पौधों पर,
चमके ऐसे जैसे पानी रेत में.
बदला रंग अब सारे घरों का,
मस्ती हो गयी दूर-दूर,
ऑ खेलने की हसरतें,
ओ नींद का आना चूर चूर,
चलो चलें स्कूल पढ़े अब,
सपने करें पूरे अपने,
हसरतें अपनी सोची समझी,
माँ बाप के अधूरे सपने,
उठो चलो अब देर हो गयी,
दादी बोली पोती से,
ठन्डे जल से मुह धोया और,
पोछा अपनी धोती से.
खाना खाओ माँ बोली,
चलो तैयार अब होना है,
आया सावन लाया खुशहाली,
नयी फसल अब बोना है,
दीदी बोली भैय्या से,
स्कूल चलो अब जाना है,
वही बोझ भरी बस्ते का,
वही रिक्शे वाला नाना है,
स्कूल पहुच तब छोटू बोला,
मजा बहुत अब आयेगा,
खेलूँगा नए दोस्तों के संग मैं,
ख़ुशी-कुशी दिन कट जायेगा,
स्कूलों में अब आई बहारें,
खिली हरियाली खेतों में,
"नई किरन" जब पड़ी पौधों पर,
चमके ऐसे जैसे पानी रेत में.
बदला रंग अब सारे घरों का,
मस्ती हो गयी दूर-दूर,
ऑ खेलने की हसरतें,
ओ नींद का आना चूर चूर,
चलो चलें स्कूल पढ़े अब,
सपने करें पूरे अपने,
हसरतें अपनी सोची समझी,
माँ बाप के अधूरे सपने,
प्रिय दीपक जी,
ReplyDeleteआप पहाड़ के रहने वाले हैं. मैं दो वर्ष हल्द्वानी और तीन वर्ष अपनी सर्विस के दौरान देहरादून में रह चुका हूँ.पूरा उत्तराखंड घूमा हुआ है.वहां का वातावरण, उसकी हरियाली,पेड़-पहाड़, वाक़ई सब बहुत अच्छे लगते हैं .
आप मेरे ब्लॉग पे गए,मेरी ग़ज़ल की सराहना की,धन्यवाद.
कविता लिखना किसी तपस्या से कम नहीं.आप जिस विधा में लिख रहे हैं या लिखना चाहते हैं, उसकी शिल्प की जानकारी भी करते चलेंगे तो कविता में आकर्षण बढ़ता जायेगा.भावों की दृष्टि से आपकी कवितायें अच्छी हैं.
शुभकामनायें.
कुँवर कुसुमेश
बचपन के दिन याद आ गये .
ReplyDeleteबहुत खूब दीपक जी .