माँ
तू सुख, तू खुशी
तू त्याग, तू समर्पण
तू दुवा, तू दवा
तू फुलवारी, तू बचपन की यारी
तू ख्वाब, तू हकीकत
तू होली, तू दीवाली
तू मक्का, तू मदीना
तू वेद, तू पुराण
तू गीता, तू रामायण
तू रब, तू ही सब।
दिनाँक - 12 मई 2019
माँ
तू सुख, तू खुशी
तू त्याग, तू समर्पण
तू दुवा, तू दवा
तू फुलवारी, तू बचपन की यारी
तू ख्वाब, तू हकीकत
तू होली, तू दीवाली
तू मक्का, तू मदीना
तू वेद, तू पुराण
तू गीता, तू रामायण
तू रब, तू ही सब।
दिनाँक - 12 मई 2019
हाथ की सबसे छोटी
ऊँगली को जोर से पकड़कर
जिसके साथ चलना सीखा
हँसना सीखा रोना सीखा
उस पिता से अंतिम वक़्त
क्या! तक नहीं कह पाया
कहे बिना कभी रह भी नहीं पाया
वह सब; जिसकी वे उम्मीद
नहीं करते थे और वह भी
जिसे मैं जानबूझकर नहीं कहता था
मैंने अदब से
कभी कहा नहीं या फिर
उन्होंने कभी सुना/समझा नहीं
गौत की लकड़ी की तरह अकड़
इधर भी थी और उधर भी
होती भी क्यों ना
मैं अंश-वंश भी तो
उनका ही था
पर हमेशा यह कसक रहेगी कि
काश! मैं कुछ कर पाता
कुछ सुन/समझ पाता
उनके अंतिम क्षणों के वह भाव
अंतिम ईच्छा, अंतिम बात, अंतिम सांस
काश! मैंने कभी कहा होता
मैं हूँ ना आप फिक्र मत करो
कभी उनका भार हल्का किया होता
जिसे ढोकर वह जी रहे थे
और जीते-जीते एक दिन
सुनसान रास्ते से
बिना किसी को बताये
चुपके से चले गए घर से
बिना कुछ कहे भी
हमेशा की तरह बहुत कुछ कहकर
इस बार कभी नहीं आने को।
हे पिता! मुझे माफ़ करना।
दीपक पनेरू
दिनाँक - 26 मार्च 2019
जब कोई बेवजह
हाथ की छठी उँगली की तरह
लटक कर बिना मतलब के
आपका रक्त चूसता हो
तब लगता है कि
किष्किन्धा में स्थित
ऋष्यमूक पर्वत पर
चला जाऊं
या फिर कहीं खो जाऊं
परम पावन सरस्वती की तरह
इस जग से यादों में रहने को।
दीपक पनेरू
दिनाँक - 02 जनवरी 2019