हाथ की सबसे छोटी
ऊँगली को जोर से पकड़कर
जिसके साथ चलना सीखा
हँसना सीखा रोना सीखा
उस पिता से अंतिम वक़्त
क्या! तक नहीं कह पाया
कहे बिना कभी रह भी नहीं पाया
वह सब; जिसकी वे उम्मीद
नहीं करते थे और वह भी
जिसे मैं जानबूझकर नहीं कहता था
मैंने अदब से
कभी कहा नहीं या फिर
उन्होंने कभी सुना/समझा नहीं
गौत की लकड़ी की तरह अकड़
इधर भी थी और उधर भी
होती भी क्यों ना
मैं अंश-वंश भी तो
उनका ही था
पर हमेशा यह कसक रहेगी कि
काश! मैं कुछ कर पाता
कुछ सुन/समझ पाता
उनके अंतिम क्षणों के वह भाव
अंतिम ईच्छा, अंतिम बात, अंतिम सांस
काश! मैंने कभी कहा होता
मैं हूँ ना आप फिक्र मत करो
कभी उनका भार हल्का किया होता
जिसे ढोकर वह जी रहे थे
और जीते-जीते एक दिन
सुनसान रास्ते से
बिना किसी को बताये
चुपके से चले गए घर से
बिना कुछ कहे भी
हमेशा की तरह बहुत कुछ कहकर
इस बार कभी नहीं आने को।
हे पिता! मुझे माफ़ करना।
दीपक पनेरू
दिनाँक - 26 मार्च 2019
Kuch cheejo ko peeche jaa k badal ni sakte.
ReplyDeleteजी सही कहा आपने मुझे अफ़सोस है बेहद अफसोस
Deleteये अटल सत्य है, हर चीज़ का महत्व तभी समझ में आता है जो हमारे पास नहीं होती
ReplyDeleteजी भैया, सही कहा आपने
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