Saturday, October 30, 2010

गुनाह



तेरी मजबूरियों को हम गुनाह समझ बैठे,
खुद से की थी वफ़ा इस कदर....
इम्तेहान लेती रही जिंदगी दर-ब-दर,
तेरी
गलतियों
को गुनाह समझकर........

6 comments:

  1. स्वागत।

    शुक्रिया।

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  2. आप सभी लोगो का बहुत बहुत धन्यवाद मुझे प्रोत्साहित करने के लिए मैं कोशिश करूँगा और खूब कोशिश करूँगा अच्छा से अच्छा लिख सकू.......

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