हम तो निकले थे दूर तलक जाने को,
पर रास्ता खत्म हो गया चलते चलते।
Friday, October 14, 2011
Thursday, October 13, 2011
दुश्वारी
ठंडी सी एक हवा का झौका,
चुभन सी पैदा करता है दिल में,
न जाने क्यों दिल धडकता है जोरो से,
बिना किसी जरुरत के,
ओ भी यू गुजरते है सामने से,
अजनबियों की तरह जैसे,
सूरज ढलता है शाम होते होते ।
चुभन सी पैदा करता है दिल में,
न जाने क्यों दिल धडकता है जोरो से,
बिना किसी जरुरत के,
ओ भी यू गुजरते है सामने से,
अजनबियों की तरह जैसे,
सूरज ढलता है शाम होते होते ।
Monday, September 26, 2011
आबरू
ये जमीं तेरी आबरू बचाने को थे चले,
खुद बेआबरू हो गए कैसे लिए ये फैसले,
तन थका मन रोया, साँस अटकती चली गयी,
हो चुका बर्बाद मैं अब चाहता हू जिन्दगी नयी,
तू आस है मेरी इसलिए अपनी आबरू बेचता हू,
मेरे इस खून से में तेरे बाग को सीचता हू.....दीपक पनेरू
खुद बेआबरू हो गए कैसे लिए ये फैसले,
तन थका मन रोया, साँस अटकती चली गयी,
हो चुका बर्बाद मैं अब चाहता हू जिन्दगी नयी,
तू आस है मेरी इसलिए अपनी आबरू बेचता हू,
मेरे इस खून से में तेरे बाग को सीचता हू.....दीपक पनेरू
संशय
हम बहक रहे है, इस शहर की आबो हवा में,
ये जमी ये आशमा फिर से मुझे,
उस तख़्त तक पंहुचा दे,
जहा से मै चला था खुद को बदलने...?
ये हो न सका.....!!!!! ---- दीपक पनेरू
रोते हुए पहाड़ सिसकते हुए लोग
रोते हुए पहाड़ सिसकते हुए लोग,
हँसते हुए हम और देखते हुए लोग,
जो कुछ कर सकते थे कुछ कर न सके,
जिन्होंने किया ओ कुछ था नहीं,
रोते रहे अपने की साथ ले चलो,
हमने कहा देर हो रही है इंतजार करो.......
किसका और कब तक न उन्होंने पूछा न हमने बताया,
आखिर क्यों....??????? ---दीपक पनेरू
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