Monday, September 26, 2011

आबरू

ये जमीं तेरी आबरू बचाने को थे चले,
खुद बेआबरू हो गए कैसे लिए ये फैसले,
तन थका मन रोया, साँस अटकती चली गयी,
हो चुका बर्बाद मैं अब चाहता हू जिन्दगी नयी,
तू आस है मेरी इसलिए अपनी आबरू बेचता हू,
मेरे इस खून से में तेरे बाग को सीचता हू.....दीपक पनेरू

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