भूली-बिसरी यादें
पढ़ें समझें राय दें अति महत्वपूर्ण - आलोचना जरूर करें।
Monday, September 26, 2011
संशय
हम बहक रहे है, इस शहर की आबो हवा में,
ये जमी ये आशमा फिर से मुझे,
उस तख़्त तक पंहुचा दे,
जहा से मै चला था खुद को बदलने...?
ये हो न सका.....!!!!! ----
दीपक
पनेरू
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