
Saturday, October 30, 2010
Thursday, October 14, 2010
नई किरन

दिनांक 12-07-2010
नई किरन
उठो चलो अब देर हो गयी,
दादी बोली पोती से,
ठन्डे जल से मुह धोया और,
पोछा अपनी धोती से.
खाना खाओ माँ बोली,
चलो तैयार अब होना है,
आया सावन लाया खुशहाली,
नयी फसल अब बोना है,
दीदी बोली भैय्या से,
स्कूल चलो अब जाना है,
वही बोझ भरी बस्ते का,
वही रिक्शे वाला नाना है,
स्कूल पहुच तब छोटू बोला,
मजा बहुत अब आयेगा,
खेलूँगा नए दोस्तों के संग मैं,
ख़ुशी-कुशी दिन कट जायेगा,
स्कूलों में अब आई बहारें,
खिली हरियाली खेतों में,
"नई किरन" जब पड़ी पौधों पर,
चमके ऐसे जैसे पानी रेत में.
बदला रंग अब सारे घरों का,
मस्ती हो गयी दूर-दूर,
ऑ खेलने की हसरतें,
ओ नींद का आना चूर चूर,
चलो चलें स्कूल पढ़े अब,
सपने करें पूरे अपने,
हसरतें अपनी सोची समझी,
माँ बाप के अधूरे सपने,
उठो चलो अब देर हो गयी,
दादी बोली पोती से,
ठन्डे जल से मुह धोया और,
पोछा अपनी धोती से.
खाना खाओ माँ बोली,
चलो तैयार अब होना है,
आया सावन लाया खुशहाली,
नयी फसल अब बोना है,
दीदी बोली भैय्या से,
स्कूल चलो अब जाना है,
वही बोझ भरी बस्ते का,
वही रिक्शे वाला नाना है,
स्कूल पहुच तब छोटू बोला,
मजा बहुत अब आयेगा,
खेलूँगा नए दोस्तों के संग मैं,
ख़ुशी-कुशी दिन कट जायेगा,
स्कूलों में अब आई बहारें,
खिली हरियाली खेतों में,
"नई किरन" जब पड़ी पौधों पर,
चमके ऐसे जैसे पानी रेत में.
बदला रंग अब सारे घरों का,
मस्ती हो गयी दूर-दूर,
ऑ खेलने की हसरतें,
ओ नींद का आना चूर चूर,
चलो चलें स्कूल पढ़े अब,
सपने करें पूरे अपने,
हसरतें अपनी सोची समझी,
माँ बाप के अधूरे सपने,
Monday, October 4, 2010
कुछ अनछुए पल
स्वरचित
एक छोटी सी कोशिश की है मैंने
उनकी यादों को दिल से लगाये बैठे थे,
अपने रोते हुए दिल को हसाए बैठे थे,
सुनहरे सपनो को सोचा पूरा करू,
तो देखा ओ किसी और को अपना बनाये बैठे थे.
मैं रहू न रहू पर यादों का सफ़र रहेगा,
कोई पराया तो कोई अपना रहेगा,
हम तो बिन पानी के मछली की तरह है,
तुम दूर हुए तो बस यादों का सपना रहेगा,
तुम्हारी यादों को चरागों की तरह,
तुम्हारी बातों को दिल से लगाकर,
जीने को कोशिश करता हूँ पर,
साँस अटकती है तुम्हारे बिना,
कभी अन्दर जाकर, कभी बाहर आकर.
कभी उनको कभी उनकी यादों को ,
कभी गुस्से को कभी उनकी बातों को,
दिल से लगाये बैठे है, कभी खुश तो कभी,
उनके तस्वीर के साथ हम मुरझाये बैठे है,
दिल तो करता है एक बार-
फिर मिलने की कोशिश करू,
पर ओ इससे अनजान हमको अपनों मैं भी,
पराया बनाये बैठे है.........
Thursday, September 23, 2010
फोटो
Wednesday, September 22, 2010
बचपन

बचपन
मीठी हंसी की प्यारी पाठशाला,
पल पल दोस्तों से लड़ जाना,
छुट्टी हो जो दौड़ लगाकर,
सबसे आगे घर को जाना,
माँ लोरियों से कुछ कहती,
दादी सुनाती कविता अति प्यारी,
कभी बाघ शेर की लड़ाई,
कभी कुत्ते बिल्ली की यारी,
ओ बाबूजी का डांट लगाकर,
वही माँ का फिर से मानना,
वही बहन का दद्दा कहकर,
गुस्से को मुझसे दूर भगाना,
वही बस्ते के बोझ तले जो,
दबकर तन थक जाता था,
कभी नहीं जाऊंगा स्कूल,
बार बार मन में आता था,
पढने की ना अहमियत को समझा,
ये सब बचपन की नादानी थी,
खेल कुंद ही प्यारा था तब,
साथियों की टोली अज्ञानी थी,
छोटी छोटी बातों पर भी,
ओ आँखों का भर जाना,
प्यारी भोली आँखों पर से,
बहता मोतियों का खजाना,
कितना मासूम ओ बचपन,
भूलूँ सुहाने को,
लिखते सोचते ऑंखें भर आयी,
फिर वही मोती छलकाने को.
पल पल दोस्तों से लड़ जाना,
छुट्टी हो जो दौड़ लगाकर,
सबसे आगे घर को जाना,
माँ लोरियों से कुछ कहती,
दादी सुनाती कविता अति प्यारी,
कभी बाघ शेर की लड़ाई,
कभी कुत्ते बिल्ली की यारी,
ओ बाबूजी का डांट लगाकर,
वही माँ का फिर से मानना,
वही बहन का दद्दा कहकर,
गुस्से को मुझसे दूर भगाना,
वही बस्ते के बोझ तले जो,
दबकर तन थक जाता था,
कभी नहीं जाऊंगा स्कूल,
बार बार मन में आता था,
पढने की ना अहमियत को समझा,
ये सब बचपन की नादानी थी,
खेल कुंद ही प्यारा था तब,
साथियों की टोली अज्ञानी थी,
छोटी छोटी बातों पर भी,
ओ आँखों का भर जाना,
प्यारी भोली आँखों पर से,
बहता मोतियों का खजाना,
कितना मासूम ओ बचपन,
भूलूँ सुहाने को,
लिखते सोचते ऑंखें भर आयी,
फिर वही मोती छलकाने को.
Tuesday, September 21, 2010
आशा
आशा
नया खेत और बीज नए,
सोचा बोऊंगा मेहनत से,
छलका पसीना पोचा मैंने,
मैले कुचेले तहमत से,
रही मजबूरी उन बीजों की,
जिनको था जमीं पर डाला,
प्यार दिया था अपने से ज्यादा,
अपने तन को मार डाला,
क्योंकि जब उगेगी डाली तब मैं,
अपने तन को सुख पंहुचाउंगा,
यही कह कर रहा बैठा मैं,
कल खेत जोतने जाऊंगा,
हुआ अधेरा रात आई और,
सो गया मैं मेहनत वाला,
नहीं पता मुझे मेरे जीवन में,
आने वाला है दिन काला,
उठा सबेरे बड़ी ख़ुशी से,
मौसम ने है साथ दिया,
लिए बैलों के जोड़ो को,
खेतो को है प्रस्थान किया,
मौसम ने जब बदला रंग,
देख राही परेशान हुआ,
राही लगायी जो भविष्य की आशा,
अब उस का कुछ ज्ञान हुआ,
मौसम बदला बरसा रिमझिम,
दिन आज का बर्बाद हुआ,
पूरे साल राही "आशा" कि,
कम मौसम से में आबाद रहा.
नया खेत और बीज नए,
सोचा बोऊंगा मेहनत से,
छलका पसीना पोचा मैंने,
मैले कुचेले तहमत से,
रही मजबूरी उन बीजों की,
जिनको था जमीं पर डाला,
प्यार दिया था अपने से ज्यादा,
अपने तन को मार डाला,
क्योंकि जब उगेगी डाली तब मैं,
अपने तन को सुख पंहुचाउंगा,
यही कह कर रहा बैठा मैं,
कल खेत जोतने जाऊंगा,
हुआ अधेरा रात आई और,
सो गया मैं मेहनत वाला,
नहीं पता मुझे मेरे जीवन में,
आने वाला है दिन काला,
उठा सबेरे बड़ी ख़ुशी से,
मौसम ने है साथ दिया,
लिए बैलों के जोड़ो को,
खेतो को है प्रस्थान किया,
मौसम ने जब बदला रंग,
देख राही परेशान हुआ,
राही लगायी जो भविष्य की आशा,
अब उस का कुछ ज्ञान हुआ,
मौसम बदला बरसा रिमझिम,
दिन आज का बर्बाद हुआ,
पूरे साल राही "आशा" कि,
कम मौसम से में आबाद रहा.
Thursday, July 29, 2010
दोस्त कहें या भगवान

दोस्त कहें या भगवान
तुम हो जीवन के पथदर्शक,
तुम हो जीने का आधार,
तुम्हारी छाया ही जीवन में,
बन गयी जीने का आसार।
मात पिता के प्यार का अहसास,
तुमने ही कराया है,
हे दोस्त मेरा जीवन अब तुम पर ही,
न्योछावर होने आया है।
मैं काम, क्रोधी, लोभी व आलशी,
परिचायक इनका कहलाता था,
तुमने ही मेरे जीवन को इन तत्वों से,
अंधकार मुक्त कराया है।
चाँद कि विलोम तुम सूरज जैसे,
पश्चिम कहें तो पूरब जैसे,
जिन पर तुम्हारी छाया है,
उन्होंने हर सुख पाया है।
सुख दुःख के साथी तुम हो,
तुम हो हर गुण का आधार,
तुमने ही एस मूरख को,
अतुलित दिया है प्यार।
प्रभु जैसे ही रूप मे, मै आपको,
देखते आया हूँ,
स्वीकार करो मेरी इस "दोस्ती" को,
मै झोली फैलाकर कर लाया हूँ।
तुम हो जीवन के पथदर्शक,
तुम हो जीने का आधार,
तुम्हारी छाया ही जीवन में,
बन गयी जीने का आसार।
मात पिता के प्यार का अहसास,
तुमने ही कराया है,
हे दोस्त मेरा जीवन अब तुम पर ही,
न्योछावर होने आया है।
मैं काम, क्रोधी, लोभी व आलशी,
परिचायक इनका कहलाता था,
तुमने ही मेरे जीवन को इन तत्वों से,
अंधकार मुक्त कराया है।
चाँद कि विलोम तुम सूरज जैसे,
पश्चिम कहें तो पूरब जैसे,
जिन पर तुम्हारी छाया है,
उन्होंने हर सुख पाया है।
सुख दुःख के साथी तुम हो,
तुम हो हर गुण का आधार,
तुमने ही एस मूरख को,
अतुलित दिया है प्यार।
प्रभु जैसे ही रूप मे, मै आपको,
देखते आया हूँ,
स्वीकार करो मेरी इस "दोस्ती" को,
मै झोली फैलाकर कर लाया हूँ।
दीपक पनेरू
मथेला सदन तुलसी नगर,
पॉलीशीट, हल्द्वानी।
मथेला सदन तुलसी नगर,
पॉलीशीट, हल्द्वानी।
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